श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.18

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

न्यस्तौ स्वमित्रे नन्दे वै याभ्यां ते पुरुषा हताः।

निशम्य तद् भोजपतिः कोपात् प्रचलितेन्द्रियः॥ १८

nyastau svamitre nande vai yābhyāṃ te puruṣā hatāḥ|

niśamya tad bhojapatiḥ kopāt pracalitendriyaḥ|| 18

अर्थ

‘कंस! जो कन्या तुम्हारे हाथसे छूटकर आकाशमें चली गयी, वह तो यशोदाकी पुत्री थी। और व्रजमें जो श्रीकृष्ण हैं, वे देवकीके पुत्र हैं। वहाँ जो बलरामजी हैं, वे रोहिणीके पुत्र हैं। वसुदेवने तुमसे डरकर अपने मित्र नन्दके पास उन दोनोंको रख दिया है। उन्होंने ही तुम्हारे अनुचर दैत्योंका वध किया है।’ यह बात सुनते ही कंसकी एक-एक इन्द्रिय क्रोधके मारे काँप उठी॥ १७-१८॥

यह अर्थ श्लोक 17–18 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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