श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.36.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 36 · अथ षट्त्रिंशोऽध्यायः

ततश्‍चैषा मही मित्र भवित्री नष्टकण्टका।

जरासन्धो मम गुरुर्द्विविदो दयितः सखा॥ ३५

tataścaiṣā mahī mitra bhavitrī naṣṭakaṇṭakā|

jarāsandho mama gururdvivido dayitaḥ sakhā|| 35

अर्थ

मेरे मित्र अक्रूरजी! फिर तो मैं होऊँगा और आप होंगे तथा होगा इस पृथ्वीका अकण्टक राज्य। जरासन्ध हमारे बड़े-बूढ़े ससुर हैं और वानरराज द्विविद मेरे प्यारे सखा हैं॥ ३५॥

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