श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

विशालनेत्रो विकटास्यकोटरो

बृहद्गलो नीलमहाम्बुदोपमः।

दुराशयः कंसहितं चिकीर्षु-

र्व्रजं स नन्दस्य जगाम कम्पयन्॥ २

viśālanetro vikaṭāsyakoṭaro

bṛhadgalo nīlamahāmbudopamaḥ|

durāśayaḥ kaṃsahitaṃ cikīrṣu-

rvrajaṃ sa nandasya jagāma kampayan|| 2

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कंसने जिस केशी नामक दैत्यको भेजा था, वह बड़े भारी घोड़ेके रूपमें मनके समान वेगसे दौड़ता हुआ व्रजमें आया। वह अपनी टापोंसे धरती खोदता आ रहा था! उसकी गरदनके छितराये हुए बालोंके झटकेसे आकाशके बादल और विमानोंकी भीड़ तीतर-बितर हो रही थी। उसकी भयानक हिनहिनाहटसे सब-के-सब भयसे काँप रहे थे। उसकी बड़ी-बड़ी आँखें थीं, मुँह क्या था, मानो किसी वृक्षका खोड़र ही हो। उसे देखनेसे ही डर लगता था। बड़ी मोटी गरदन थी। शरीर इतना विशाल था कि मालूम होता था काली-काली बादलकी घटा है। उसकी नीयतमें पाप भरा था। वह श्रीकृष्णको मारकर अपने स्वामी कंसका हित करना चाहता था। उसके चलनेसे भूकम्प होने लगता था॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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