श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.24

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

त्वामीश्‍वरं स्वाश्रयमात्ममायया

विनिर्मिताशेषविशेषकल्पनम् ।

क्रीडार्थमद्यात्तमनुष्यविग्रहं

नतोऽस्मि धुर्यं यदुवृष्णिसात्वताम्॥ २४

tvāmīśvaraṃ svāśrayamātmamāyayā

vinirmitāśeṣaviśeṣakalpanam |

krīḍārthamadyāttamanuṣyavigrahaṃ

nato'smi dhuryaṃ yaduvṛṣṇisātvatām|| 24

अर्थ

आप सबके अन्तर्यामी और नियन्ता हैं। अपने-आपमें स्थित, परम स्वतन्त्र हैं। जगत् और उसके अशेष विशेषों—भाव-अभावरूप सारे भेद-विभेदोंकी कल्पना केवल आपकी मायासे ही हुई है। इस समय आपने अपनी लीला प्रकट करनेके लिये मनुष्यका-सा श्रीविग्रह प्रकट किया है और आप यदु, वृष्णि तथा सात्वतवंशियोंके शिरोमणि बने हैं। प्रभो! मैं आपको नमस्कार करता हूँ’॥ २४॥

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