श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

भगवानपि गोविन्दो हत्वा केशिनमाहवे।

पशूनपालयत् पालैः प्रीतैर्व्रजसुखावहः॥ २६

bhagavānapi govindo hatvā keśinamāhave|

paśūnapālayat pālaiḥ prītairvrajasukhāvahaḥ|| 26

अर्थ

इधर भगवान् श्रीकृष्ण केशीको लड़ाईमें मारकर फिर अपने प्रेमी एवं प्रसन्‍नचित्त ग्वाल-बालोंके साथ पूर्ववत् पशु-पालनके काममें लग गये तथा व्रजवासियोंको परमानन्द वितरण करने लगे॥ २६॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें