॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.37.5
तद् वंचयित्वा तमधोक्षजो रुषा
प्रगृह्य दोर्भ्यां परिविध्य पादयोः।
सावज्ञमुत्सृज्य धनुःशतान्तरे
यथोरगं तार्क्ष्यसुतो व्यवस्थितः॥ ५
tad vaṃcayitvā tamadhokṣajo ruṣā
pragṛhya dorbhyāṃ parividhya pādayoḥ|
sāvajñamutsṛjya dhanuḥśatāntare
yathoragaṃ tārkṣyasuto vyavasthitaḥ|| 5
अर्थ
परन्तु भगवान्ने उससे अपनेको बचा लिया। भला, वह इन्द्रियातीतको कैसे मार पाता! उन्होंने अपने दोनों हाथोंसे उसके दोनों पिछले पैर पकड़ लिये और जैसे गरुड़ साँपको पकड़कर झटक देते हैं, उसी प्रकार क्रोधसे उसे घुमाकर बड़े अपमानके साथ चार सौ हाथकी दूरीपर फेंक दिया और स्वयं अकड़कर खड़े हो गये॥ ५॥