श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.37.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 37 · अथ सप्तत्रिंशोऽध्यायः

समेधमानेन स कृष्णबाहुना ✎ 1163

निरुद्धवायुश्‍चरणांश्‍च विक्षिपन्।

प्रस्विन्‍नगात्रः परिवृत्तलोचनः

पपात लेण्डं विसृजन् क्षितौ व्यसुः॥ ८

samedhamānena sa kṛṣṇabāhunā

niruddhavāyuścaraṇāṃśca vikṣipan|

prasvinnagātraḥ parivṛttalocanaḥ

papāta leṇḍaṃ visṛjan kṣitau vyasuḥ|| 8

अर्थ

अचिन्त्यशक्ति भगवान् श्रीकृष्णका हाथ उसके मुँहमें इतना बढ़ गया कि उसकी साँसके भी आने-जानेका मार्ग न रहा। अब तो दम घुटनेके कारण वह पैर पीटने लगा। उसका शरीर पसीनेसे लथपथ हो गया, आँखोंकी पुतली उलट गयी, वह मल-त्याग करने लगा। थोड़ी ही देरमें उसका शरीर निश्‍चेष्ट होकर पृथ्वीपर गिर पड़ा तथा उसके प्राण-पखेरू उड़ गये॥ ८॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1163 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): कृष्णबाहुन → कृष्णबाहुना

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