श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.38.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 38 · अथाष्टात्रिंशोऽध्यायः

सुहृत्तमं ज्ञातिमनन्यदैवतं

दोर्भ्यां बृहद‍्भ्यां परिरप्स्यतेऽथ माम्।

आत्मा हि तीर्थीक्रियते तदैव मे

बन्धश्‍च कर्मात्मक उच्छ्वसित्यतः॥ २०

suhṛttamaṃ jñātimananyadaivataṃ

dorbhyāṃ bṛhadbhyāṃ parirapsyate'tha mām|

ātmā hi tīrthīkriyate tadaiva me

bandhaśca karmātmaka ucchvasityataḥ|| 20

अर्थ

मैं उनके कुटुम्बका हूँ और उनका अत्यन्त हित चाहता हूँ। उनके सिवा और कोई मेरा आराध्यदेव भी नहीं है। ऐसी स्थितिमें वे अपनी लंबी-लंबी बाँहोंसे पकड़कर मुझे अवश्य अपने हृदयसे लगा लेंगे। अहा! उस समय मेरी तो देह पवित्र होगी ही, वह दूसरोंको पवित्र करनेवाली भी बन जायगी और उसी समय—उनका आलिंगन प्राप्त होते ही—मेरे कर्ममय बन्धन, जिनके कारण मैं अनादिकालसे भटक रहा हूँ, टूट जायँगे॥ २०॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें