lebhe manorathān sarvān pathi yān sa cakāra ha|| 1
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने अक्रूरजीका भलीभाँति सम्मान किया। वे आरामसे पलँगपर बैठ गये। उन्होंने मार्गमें जो-जो अभिलाषाएँ की थीं, वे सब पूरी हो गयीं॥ १॥
सुखोपविष्टः पर्यंके रामकृष्णोरुमानितः।
लेभे मनोरथान् सर्वान् पथि यान् स चकार ह॥ १
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजीने अक्रूरजीका भलीभाँति सम्मान किया। वे आरामसे पलँगपर बैठ गये। उन्होंने मार्गमें जो-जो अभिलाषाएँ की थीं, वे सब पूरी हो गयीं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 373) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/1/