॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.17
गतिं सुललितां चेष्टां स्निग्धहासावलोकनम्।
शोकापहानि नर्माणि प्रोद्दामचरितानि च॥ १७
gatiṃ sulalitāṃ ceṣṭāṃ snigdhahāsāvalokanam|
śokāpahāni narmāṇi proddāmacaritāni ca|| 17
अर्थ
गोपियाँ मन-ही-मन भगवान्की लटकीली चाल, भाव-भंगी, प्रेमभरी मुसकान, चितवन, सारे शोकोंको मिटा देनेवाली ठिठोलियाँ तथा उदारता-भरी लीलाओंका चिन्तन करने लगीं और उनके विरहके भयसे कातर हो गयीं। उनका हृदय, उनका जीवन—सब कुछ भगवान्के प्रति समर्पित था। उनकी आँखोंसे आँसू बह रहे थे। वे झुंड-की-झुंड इकट्ठी होकर इस प्रकार कहने लगीं॥ १७-१८॥