श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.19

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

गोप्य ऊचुः

अहो विधातस्तव न क्वचिद् दया

संयोज्य मैत्र्या प्रणयेन देहिनः।

तांश्‍चाकृतार्थान् वियुनङ्क्ष्यपार्थकं

विक्रीडितं तेऽर्भकचेष्टितं यथा॥ १९

aho vidhātastava na kvacid dayā

saṃyojya maitryā praṇayena dehinaḥ|

tāṃścākṛtārthān viyunaṅkṣyapārthakaṃ

vikrīḍitaṃ te'rbhakaceṣṭitaṃ yathā|| 19

अर्थ

गोपियोंने कहा—धन्य हो विधाता! तुम सब कुछ विधान तो करते हो, परन्तु तुम्हारे हृदयमें दयाका लेश भी नहीं है। पहले तो तुम सौहार्द और प्रेमसे जगत‍्के प्राणियोंको एक-दूसरेके साथ जोड़ देते हो, उन्हें आपसमें एक कर देते हो; मिला देते हो परन्तु अभी उनकी आशा-अभिलाषाएँ पूरी भी नहीं हो पातीं, वे तृप्त भी नहीं हो पाते कि तुम उन्हें व्यर्थ ही अलग-अलग कर देते हो! सच है, तुम्हारा यह खिलवाड़ बच्चोंके खेलकी तरह व्यर्थ ही है॥ १९॥

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