॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.39.22
न नन्दसूनुः क्षणभंगसौहृदः
समीक्षते नः स्वकृतातुरा बत।
विहाय गेहान् स्वजनान् सुतान् पतीं-
स्तद्दास्यमद्धोपगता नवप्रियः॥ २२
na nandasūnuḥ kṣaṇabhaṃgasauhṛdaḥ
samīkṣate naḥ svakṛtāturā bata|
vihāya gehān svajanān sutān patīṃ-
staddāsyamaddhopagatā navapriyaḥ|| 22
अर्थ
अहो! नन्दनन्दन श्यामसुन्दरको भी नये-नये लोगोंसे नेह लगानेकी चाट पड़ गयी है। देखो तो सही—इनका सौहार्द, इनका प्रेम एक क्षणमें ही कहाँ चला गया? हम तो अपने घर-द्वार, स्वजन-सम्बन्धी, पति-पुत्र आदिको छोड़कर इनकी दासी बनीं और इन्हींके लिये आज हमारा हृदय शोकातुर हो रहा है, परन्तु ये ऐसे हैं कि हमारी ओर देखतेतक नहीं॥ २२॥