परन्तु फिर उन्होंने वहाँ भी देखा कि साक्षात् अनन्तदेव श्रीशेषजी विराजमान हैं और सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं असुर अपने-अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे हैं॥ ४४॥✎ 14331434
भूयस्तत्रापि सोऽद्राक्षीत् स्तूयमानमहीश्वरम्।
सिद्धचारणगन्धर्वैरसुरैर्नतकन्धरैः ॥ ४४
परन्तु फिर उन्होंने वहाँ भी देखा कि साक्षात् अनन्तदेव श्रीशेषजी विराजमान हैं और सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं असुर अपने-अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे हैं॥ ४४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.39.44 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 379) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/39/44/
टिप्पणियाँ
१
सिद्धैर्भुजंगपतिभिरसु०।
(मुद्रित पृष्ठ 379)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)