श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.44

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

भूयस्तत्रापि सोऽद्राक्षीत् स्तूयमानमहीश्‍वरम्।

सि१द्धचारणगन्धर्वैरसुरैर्नतकन्धरैः ॥ ४४

bhūyastatrāpi so'drākṣīt stūyamānamahīśvaram|

siddhacāraṇagandharvairasurairnatakandharaiḥ || 44

अर्थ

परन्तु फिर उन्होंने वहाँ भी देखा कि साक्षात् अनन्तदेव श्रीशेषजी विराजमान हैं और सिद्ध, चारण, गन्धर्व एवं असुर अपने-अपने सिर झुकाकर उनकी स्तुति कर रहे हैं॥ ४४॥✎ 1433 1434

टिप्पणियाँ

  1. १

    सिद्धैर्भुजंगपतिभिरसु०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 379)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)
  • #1434 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणिके → मरकतमणिके

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