श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

प्रलम्बपीवरभुजं तुंगांसोरःस्थलश्रियम्।

कम्बुकण्ठं निम्‍ननाभिं वलिमत्पल्लवोदरम्॥ ४८

pralambapīvarabhujaṃ tuṃgāṃsoraḥsthalaśriyam|

kambukaṇṭhaṃ nimnanābhiṃ valimatpallavodaram|| 48

अर्थ

बाँहें घुटनोंतक लंबी और हृष्ट-पुष्ट हैं। कंधे ऊँचे और वक्षःस्थल लक्ष्मीजीका आश्रय-स्थान है। शंखके समान उतार-चढ़ाववाला सुडौल गला, गहरी नाभि और त्रिवलीयुक्त उदर पीपलके पत्तेके समान शोभायमान है॥ ४८॥✎ 1433 1434

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1433 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): ब्रह्महृद) → ब्रह्मह्रद)
  • #1434 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: मरकत-मणिके → मरकतमणिके

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