श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.39.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 39 · अथैकोनचत्वारिंशोऽध्यायः

विलोक्य सुभृशं प्रीतो१ भक्त्या परमया युतः।

हृष्यत्तनूरुहो भावपरिक्लिन्‍नात्मलोचनः॥ ५६

vilokya subhṛśaṃ prīto bhaktyā paramayā yutaḥ|

hṛṣyattanūruho bhāvapariklinnātmalocanaḥ|| 56

अर्थ

भगवान्‌की यह झाँकी निरखकर अक्रूरजीका हृदय परमानन्दसे लबालब भर गया। उन्हें परम भक्ति प्राप्त हो गयी। सारा शरीर हर्षावेशसे पुलकित हो गया। प्रेमभावका उद्रेक होनेसे उनके नेत्र आँसूसे भर गये॥ ५६॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    शान्तं।

    (मुद्रित पृष्ठ 381)

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