श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.4.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 4 · अथ चतुर्थोऽध्यायः

क्षमध्वं मम दौरात्म्यं साधवो दीन१वत्सलाः।

इत्युक्त्वाश्रुमुखः पादौ श्यालः स्वस्रोरथाग्रहीत्॥ २३

kṣamadhvaṃ mama daurātmyaṃ sādhavo dīnavatsalāḥ|

ityuktvāśrumukhaḥ pādau śyālaḥ svasrorathāgrahīt|| 23

अर्थ

मेरी यह दुष्टता तुम दोनों क्षमा करो; क्योंकि तुम बड़े ही साधुस्वभाव और दीनोंके रक्षक हो।’ ऐसा कहकर कंसने अपनी बहिन देवकी और वसुदेवजीके चरण पकड़ लिये। उसकी आँखोंसे आँसू बह-बहकर मुँहतक आ रहे थे॥ २३॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    बन्धुव०।

    (मुद्रित पृष्ठ 148)

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