evaṃ durmantribhiḥ kaṃsaḥ saha sammantrya durmatiḥ|
brahmahiṃsāṃ hitaṃ mene kālapāśāvṛto'suraḥ|| 43
अर्थ
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय॥ ४३॥
एवं दुर्मन्त्रिभिः कंसः सह सम्मन्त्र्य दुर्मतिः।
ब्रह्महिंसां हितं मेने कालपाशावृतोऽसुरः॥ ४३
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! एक तो कंसकी बुद्धि स्वयं ही बिगड़ी हुई थी; फिर उसे मन्त्री ऐसे मिले थे, जो उससे भी बढ़कर दुष्ट थे। इस प्रकार उनसे सलाह करके कालके फंदेमें फँसे हुए असुर कंसने यही ठीक समझा कि ब्राह्मणोंको ही मार डाला जाय॥ ४३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.4.43 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 150) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/4/43/