श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.1

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

अक्रूरजीके द्वारा भगवान् श्रीकृष्णकी स्तुति

अक्रूर उवाच

नतोऽस्म्यहं त्वाखिलहेतुहेतुं

नारायणं पूरुषमाद्यमव्ययम्।

यन्‍नाभिजातादरविन्दकोशाद्

ब्रह्माऽऽविरासीद् यत एष लोकः॥ १

nato'smyahaṃ tvākhilahetuhetuṃ

nārāyaṇaṃ pūruṣamādyamavyayam|

yannābhijātādaravindakośād

brahmā''virāsīd yata eṣa lokaḥ|| 1

अर्थ

अक्रूरजी बोले—प्रभो! आप प्रकृति आदि समस्त कारणोंके परम कारण हैं। आप ही अविनाशी पुरुषोत्तम नारायण हैं तथा आपके ही नाभिकमलसे उन ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ है, जिन्होंने इस चराचर जगत‍्की सृष्टि की है। मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ॥ १॥

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