श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.14

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा

मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः।

निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति- ✎ 2098

र्मेढ्रस्तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते॥ १४

romāṇi vṛkṣauṣadhayaḥ śiroruhā

meghāḥ parasyāsthinakhāni te'drayaḥ|

nimeṣaṇaṃ rātryahanī prajāpati-

rmeḍhrastu vṛṣṭistava vīryamiṣyate|| 14

अर्थ

वृक्ष और ओषधियाँ रोम हैं। मेघ सिरके केश हैं। पर्वत आपके अस्थिसमूह और नख हैं। दिन और रात पलकोंका खोलना और मींचना है। प्रजापति जननेन्द्रिय हैं और वृष्टि ही आपका वीर्य है॥ १४॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2098 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): रात्रॺहनी → रात्र्यहनी

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