वृक्ष और ओषधियाँ रोम हैं। मेघ सिरके केश हैं। पर्वत आपके अस्थिसमूह और नख हैं। दिन और रात पलकोंका खोलना और मींचना है। प्रजापति जननेन्द्रिय हैं और वृष्टि ही आपका वीर्य है॥ १४॥
रोमाणि वृक्षौषधयः शिरोरुहा
मेघाः परस्यास्थिनखानि तेऽद्रयः।
निमेषणं रात्र्यहनी प्रजापति-
र्मेढ्रस्तु वृष्टिस्तव वीर्यमिष्यते॥ १४
वृक्ष और ओषधियाँ रोम हैं। मेघ सिरके केश हैं। पर्वत आपके अस्थिसमूह और नख हैं। दिन और रात पलकोंका खोलना और मींचना है। प्रजापति जननेन्द्रिय हैं और वृष्टि ही आपका वीर्य है॥ १४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.40.14 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 383) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/40/14/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)