भगवन्! ये सब-के-सब जीव आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं और इस मोहके कारण ही ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ इस झूठे दुराग्रहमें फँसकर कर्मके मार्गोंमें भटक रहे हैं॥ २३॥
भगवञ्जीवलोकोऽयं मोहितस्तव मायया।
अहंममेत्यसद्ग्राहो भ्राम्यते कर्मवर्त्मसु॥ २३
भगवन्! ये सब-के-सब जीव आपकी मायासे मोहित हो रहे हैं और इस मोहके कारण ही ‘यह मैं हूँ और यह मेरा है’ इस झूठे दुराग्रहमें फँसकर कर्मके मार्गोंमें भटक रहे हैं॥ २३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.40.23 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 384) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/40/23/