॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.40.26
यथाबुधो जलं हित्वा प्रतिच्छन्नं तदुद्भवैः।
अभ्येति मृगतृष्णां वै तद्वत्त्वाहं पराङ्मुखः॥ २६
yathābudho jalaṃ hitvā praticchannaṃ tadudbhavaiḥ|
abhyeti mṛgatṛṣṇāṃ vai tadvattvāhaṃ parāṅmukhaḥ|| 26
अर्थ
जैसे कोई अनजान मनुष्य जलके लिये तालाबपर जाय और उसे उसीसे पैदा हुए सिवार आदि घासोंसे ढका देखकर ऐसा समझ ले कि यहाँ जल नहीं है, तथा सूर्यकी किरणोंमें झूठ-मूठ प्रतीत होनेवाले जलके लिये मृगतृष्णाकी ओर दौड़ पड़े, वैसे ही मैं अपनी ही मायासे छिपे रहनेके कारण आपको छोड़कर विषयोंमें सुखकी आशासे भटक रहा हूँ॥ २६॥✎ 1671