श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.40.5

दशम स्कन्ध · अध्याय 40 · अथ चत्वारिंशोऽध्यायः

त्रय्या च विद्यया केचित् त्वां वै वैतानिका द्विजाः।

यजन्ते विततैर्यज्ञैर्नानारूपामराख्यया॥ ५

trayyā ca vidyayā kecit tvāṃ vai vaitānikā dvijāḥ|

yajante vitatairyajñairnānārūpāmarākhyayā|| 5

अर्थ

बहुत-से कर्मकाण्डी ब्राह्मण कर्ममार्गका उपदेश करनेवाली त्रयीविद्याके द्वारा, जो आपके इन्द्र, अग्‍नि आदि अनेक देववाचक नाम तथा वज्रहस्त, सप्तार्चि आदि अनेक रूप बतलाती है, बड़े-बड़े यज्ञ करते हैं और उनसे आपकी ही उपासना करते हैं॥ ५॥

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