श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.41.16

दशम स्कन्ध · अध्याय 41 · अथैकचत्वारिंशोऽध्यायः

देवदेव जगन्‍नाथ पुण्यश्रवणकीर्तन।

यदूत्तमोत्तमश्‍लोक नारायण नमोऽस्तु ते॥ १६

devadeva jagannātha puṇyaśravaṇakīrtana|

yadūttamottamaśloka nārāyaṇa namo'stu te|| 16

अर्थ

यदुवंशशिरोमणे! आप देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। जगत‍्के स्वामी हैं। आपके गुण और लीलाओंका श्रवण तथा कीर्तन बड़ा ही मंगलकारी है। उत्तम पुरुष आपके गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं। नारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १६॥✎ 2101

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #2101 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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