यदुवंशशिरोमणे! आप देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। जगत्के स्वामी हैं। आपके गुण और लीलाओंका श्रवण तथा कीर्तन बड़ा ही मंगलकारी है। उत्तम पुरुष आपके गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं। नारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १६॥✎ 2101
देवदेव जगन्नाथ पुण्यश्रवणकीर्तन।
यदूत्तमोत्तमश्लोक नारायण नमोऽस्तु ते॥ १६
यदुवंशशिरोमणे! आप देवताओंके भी आराध्यदेव हैं। जगत्के स्वामी हैं। आपके गुण और लीलाओंका श्रवण तथा कीर्तन बड़ा ही मंगलकारी है। उत्तम पुरुष आपके गुणोंका कीर्तन करते रहते हैं। नारायण! मैं आपको नमस्कार करता हूँ॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 387) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/16/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)