मैं आपका दास हूँ। आप दोनों मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ। भगवन्! जीवपर आपका यह बहुत बड़ा अनुग्रह है, पूर्ण कृपाप्रसाद है कि आप उसे आज्ञा देकर किसी कार्यमें नियुक्त करते हैं॥ ४८॥
तावाज्ञापयतं भृत्यं किमहं करवाणि वाम्।
पुंसोऽत्यनुग्रहो ह्येष भवद्भिर्यन्नियुज्यते॥ ४८
मैं आपका दास हूँ। आप दोनों मुझे आज्ञा दीजिये कि मैं आपलोगोंकी क्या सेवा करूँ। भगवन्! जीवपर आपका यह बहुत बड़ा अनुग्रह है, पूर्ण कृपाप्रसाद है कि आप उसे आज्ञा देकर किसी कार्यमें नियुक्त करते हैं॥ ४८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.41.48 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 392) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/41/48/