जब धनुष टूटा तब उसके शब्दसे आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ भर गयीं; उसे सुनकर कंस भी भयभीत हो गया॥ १८॥
धनुषो भज्यमानस्य शब्दः खं रोदसी दिशः।
पूरयामास यं श्रुत्वा कंसस्त्रासमुपागमत्॥ १८
जब धनुष टूटा तब उसके शब्दसे आकाश, पृथ्वी और दिशाएँ भर गयीं; उसे सुनकर कंस भी भयभीत हो गया॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 394) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/42/18/