paśyan maraṇasantrasto nidrāṃ lebhe na cintayā|| 31
अर्थ
स्वप्न और जाग्रत्-अवस्थामें उसने इसी प्रकारके और भी बहुत-से अपशकुन देखे। उनके कारण उसे बड़ी चिन्ता हो गयी, वह मृत्युसे डर गया और उसे नींद न आयी॥ ३१॥
अन्यानि चेत्थंभूतानि स्वप्नजागरितानि च।
पश्यन् मरणसन्त्रस्तो निद्रां लेभे न चिन्तया॥ ३१
स्वप्न और जाग्रत्-अवस्थामें उसने इसी प्रकारके और भी बहुत-से अपशकुन देखे। उनके कारण उसे बड़ी चिन्ता हो गयी, वह मृत्युसे डर गया और उसे नींद न आयी॥ ३१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.42.31 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 396) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/42/31/