श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.43.22

दशम स्कन्ध · अध्याय 43 · अथ त्रिचत्वारिंशोऽध्यायः

ऊचुः परस्परं ते वै यथादृष्टं यथाश्रुतम्।

तद्रूपगुणमाधुर्यप्रागल्भ्यस्मारिता इव॥ २२

ūcuḥ parasparaṃ te vai yathādṛṣṭaṃ yathāśrutam|

tadrūpaguṇamādhuryaprāgalbhyasmāritā iva|| 22

अर्थ

उनके सौन्दर्य, गुण, माधुर्य और निर्भयताने मानो दर्शकोंको उनकी लीलाओंका स्मरण करा दिया और वे लोग आपसमें उनके सम्बन्धकी देखी-सुनी बातें कहने-सुनने लगे॥ २२॥

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