तमाचा लगनेसे वह काँप उठा और आँधीसे उखड़े हुए वृक्षके समान अत्यन्त व्यथित और अन्तमें प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २५॥
प्रवेपितः स रुधिरमुद्वमन् मुखतोऽर्दितः।
व्यसुः पपातोर्व्युपस्थे वाताहत इवाङ्घ्रिपः॥ २५
तमाचा लगनेसे वह काँप उठा और आँधीसे उखड़े हुए वृक्षके समान अत्यन्त व्यथित और अन्तमें प्राणहीन होकर खून उगलता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 405) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/25/