कंस इस प्रकार बढ़-बढ़कर बकवाद कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर फुर्तीसे वेगपूर्वक उछलकर लीलासे ही उसके ऊँचे मंचपर जा चढ़े॥ ३४॥
एवं विकत्थमाने वै कंसे प्रकुपितोऽव्ययः।
लघिम्नोत्पत्य तरसा मंचमुत्तुंगमारुहत्॥ ३४
कंस इस प्रकार बढ़-बढ़कर बकवाद कर रहा था कि अविनाशी श्रीकृष्ण कुपित होकर फुर्तीसे वेगपूर्वक उछलकर लीलासे ही उसके ऊँचे मंचपर जा चढ़े॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.44.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 406) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/44/34/