प्रिय परीक्षित्! अब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबाके पास आये और गले लगनेके बाद उनसे कहने लगे—॥ २०॥✎ 1674
अथ नन्दं समासाद्य भगवान् देवकीसुतः।
संकर्षणश्च राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतुः॥ २०
प्रिय परीक्षित्! अब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबाके पास आये और गले लगनेके बाद उनसे कहने लगे—॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 410) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)