श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.20

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

अथ नन्दं समासाद्य भगवान् देवकीसुतः।

संकर्षणश्‍च राजेन्द्र परिष्वज्येदमूचतुः॥ २०

atha nandaṃ samāsādya bhagavān devakīsutaḥ|

saṃkarṣaṇaśca rājendra pariṣvajyedamūcatuḥ|| 20

अर्थ

प्रिय परीक्षित्! अब देवकीनन्दन भगवान् श्रीकृष्ण और बलरामजी दोनों ही नन्दबाबाके पास आये और गले लगनेके बाद उनसे कहने लगे—॥ २०॥✎ 1674

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1674 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्द-बाबाने → नन्दबाबाने

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