श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.23

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

यात यूयं व्रजं तात वयं च स्नेहदुःखितान्।

ज्ञातीन् वो द्रष्टुमेष्यामो विधाय सुहृदां सुखम्॥ २३

yāta yūyaṃ vrajaṃ tāta vayaṃ ca snehaduḥkhitān|

jñātīn vo draṣṭumeṣyāmo vidhāya suhṛdāṃ sukham|| 23

अर्थ

पिताजी! अब आपलोग व्रजमें जाइये। इसमें सन्देह नहीं कि हमारे बिना वात्सल्य-स्नेहके कारण आपलोगोंको बहुत दुःख होगा। यहाँके सुहृद्-सम्बन्धियोंको सुखी करके हम आपलोगोंसे मिलनेके लिये आयेंगे’॥ २३॥✎ 1674

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1674 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: नन्द-बाबाने → नन्दबाबाने

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