pūrayannaśrubhirnetre saha gopairvrajaṃ yayau|| 25
अर्थ
भगवान्की बात सुनकर नन्दबाबाने प्रेमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले लगा लिया और फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर गोपोंके साथ व्रजके लिये प्रस्थान किया॥ २५॥✎ 1674
इत्युक्तस्तौ परिष्वज्य नन्दः प्रणयविह्वलः।
पूरयन्नश्रुभिर्नेत्रे सह गोपैर्व्रजं ययौ॥ २५
भगवान्की बात सुनकर नन्दबाबाने प्रेमसे अधीर होकर दोनों भाइयोंको गले लगा लिया और फिर नेत्रोंमें आँसू भरकर गोपोंके साथ व्रजके लिये प्रस्थान किया॥ २५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.25 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 410) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/25/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)