श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.29

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

ततश्‍च लब्धसंस्कारौ द्विजत्वं प्राप्य सुव्रतौ।

गर्गाद् यदुकुलाचार्याद् गायत्रं व्रतमास्थितौ॥ २९

tataśca labdhasaṃskārau dvijatvaṃ prāpya suvratau|

gargād yadukulācāryād gāyatraṃ vratamāsthitau|| 29

अर्थ

इस प्रकार यदुवंशके आचार्य गर्गजीसे संस्कार कराकर बलरामजी और भगवान् श्रीकृष्ण द्विजत्वको प्राप्त हुए। उनका ब्रह्मचर्यव्रत अखण्ड तो था ही, अब उन्होंने गायत्रीपूर्वक अध्ययन करनेके लिये उसे नियमतः स्वीकार किया॥ २९॥

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