श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

गत्वा जनार्दनः शंखं प्रदध्मौ सहलायुधः।

शंखनिर्ह्रादमाकर्ण्य प्रजासंयमनो यमः॥ ४३ ✎ 1172

gatvā janārdanaḥ śaṃkhaṃ pradadhmau sahalāyudhaḥ|

śaṃkhanirhrādamākarṇya prajāsaṃyamano yamaḥ|| 43

अर्थ

तब उसके शरीरका शंख लेकर भगवान् रथपर चले आये। वहाँसे बलरामजीके साथ श्रीकृष्णने यमराजकी प्रिय पुरी संयमनीमें जाकर अपना शंख बजाया। शंखका शब्द सुनकर सारी प्रजाका शासन करनेवाले यमराजने उनका स्वागत किया और भक्तिभावसे भरकर विधिपूर्वक उनकी बहुत बड़ी पूजा की। उन्होंने नम्रतासे झुककर समस्त प्राणियोंके हृदयमें विराजमान सच्चिदानन्द-स्वरूप भगवान् श्रीकृष्णसे कहा—‘लीलासे ही मनुष्य बने हुए सर्वव्यापक परमेश्‍वर! मैं आप दोनोंकी क्या सेवा करूँ?’॥ ४२—४४॥

यह अर्थ श्लोक 42–44 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1172 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): शंखनिर्हृदमाकर्ण्य → शंखनिर्ह्रादमाकर्ण्य

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