॥ श्रीहरिः ॥
तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः।
मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः॥ ८
tannāvakalpayoḥ kaṃsānnityamudvignacetasoḥ|
moghamete vyatikrāntā divasā vāmanarcatoḥ|| 8
अर्थ
पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ ही बीत गये। क्योंकि कंसके भयसे सदा उद्विग्नचित्त रहनेके कारण हम आपकी सेवा करनेमें असमर्थ रहे॥ ८॥
तन्नावकल्पयोः कंसान्नित्यमुद्विग्नचेतसोः।
मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः॥ ८
पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ ही बीत गये। क्योंकि कंसके भयसे सदा उद्विग्नचित्त रहनेके कारण हम आपकी सेवा करनेमें असमर्थ रहे॥ ८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.45.8 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 409) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/45/8/