श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.45.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 45 · अथ पञ्चचत्वारिंशोऽध्यायः

तन्‍नावकल्पयोः कंसान्‍नित्यमुद्वि‌ग्‍नचेतसोः।

मोघमेते व्यतिक्रान्ता दिवसा वामनर्चतोः॥ ८

tannāvakalpayoḥ kaṃsānnityamudvignacetasoḥ|

moghamete vyatikrāntā divasā vāmanarcatoḥ|| 8

अर्थ

पिताजी! हमारे इतने दिन व्यर्थ ही बीत गये। क्योंकि कंसके भयसे सदा उद्वि‌ग्‍नचित्त रहनेके कारण हम आपकी सेवा करनेमें असमर्थ रहे॥ ८॥

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