॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.12
अग्न्यर्कातिथिगोविप्रपितृदेवार्चनान्वितैः ।
धूपदीपैश्च माल्यैश्च गोपावासैर्मनोरमम्॥ १२
agnyarkātithigoviprapitṛdevārcanānvitaiḥ |
dhūpadīpaiśca mālyaiśca gopāvāsairmanoramam|| 12
अर्थ
गोपोंके घरोंमें अग्नि, सूर्य, अतिथि, गौ, ब्राह्मण और देवता-पितरोंकी पूजा की हुई थी। धूपकी सुगन्ध चारों ओर फैल रही थी और दीपक जगमगा रहे थे। उन घरोंको पुष्पोंसे सजाया गया था। ऐसे मनोहर गृहोंसे सारा व्रज और भी मनोरम हो रहा था॥ १२॥