तब नन्दबाबाने उनसे पूछा—‘परम भाग्यवान् उद्धवजी! अब हमारे सखा वसुदेवजी जेलसे छूट गये। उनके आत्मीय स्वजन तथा पुत्र आदि उनके साथ हैं। इस समय वे सब कुशलसे तो हैं न?॥ १६॥
कच्चिदङ्ग महाभाग सखा नः शूरनन्दनः।
आस्ते कुशल्यपत्याद्यैर्युक्तो मुक्तः सुहृद्वृतः॥ १६
तब नन्दबाबाने उनसे पूछा—‘परम भाग्यवान् उद्धवजी! अब हमारे सखा वसुदेवजी जेलसे छूट गये। उनके आत्मीय स्वजन तथा पुत्र आदि उनके साथ हैं। इस समय वे सब कुशलसे तो हैं न?॥ १६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.46.16 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 416) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/46/16/