श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.46.33

दशम स्कन्ध · अध्याय 46 · अथ षट्चत्वारिंशोऽध्यायः

तस्मिन् भवन्तावखिलात्महेतौ

नारायणे कारणमर्त्यमूर्तौ।

भावं विधत्तां नितरां महात्मन्

किं वावशिष्टं युवयोः सुकृत्यम्॥ ३३

tasmin bhavantāvakhilātmahetau

nārāyaṇe kāraṇamartyamūrtau|

bhāvaṃ vidhattāṃ nitarāṃ mahātman

kiṃ vāvaśiṣṭaṃ yuvayoḥ sukṛtyam|| 33

अर्थ

वे भगवान् ही, जो सबके आत्मा और परम कारण हैं, भक्तोंकी अभिलाषा पूर्ण करने और पृथ्वीका भार उतारनेके लिये मनुष्यका-सा शरीर ग्रहण करके प्रकट हुए हैं। उनके प्रति आप दोनोंका ऐसा सुदृढ़ वात्सल्यभाव है; फिर महात्माओ! आप दोनोंके लिये अब कौन-सा शुभ कर्म करना शेष रह जाता है॥ ३३॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें