॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.46.45
ता दीपदीप्तैर्मणिभिर्विरेजू
रज्जूर्विकर्षद्भुजकंकणस्रजः ।
चलन्नितम्बस्तनहारकुण्डल-
त्विषत्कपोलारुणकुंकुमाननाः ॥ ४५
tā dīpadīptairmaṇibhirvirejū
rajjūrvikarṣadbhujakaṃkaṇasrajaḥ |
calannitambastanahārakuṇḍala-
tviṣatkapolāruṇakuṃkumānanāḥ || 45
अर्थ
गोपियोंकी कलाइयोंमें कंगन शोभायमान हो रहे थे, रस्सी खींचते समय वे बहुत भली मालूम हो रही थीं। उनके नितम्ब, स्तन और गलेके हार हिल रहे थे। कानोंके कुण्डल हिल-हिलकर उनके कुंकुममण्डित कपोलोंकी लालिमा बढ़ा रहे थे। उनके आभूषणोंकी मणियाँ दीपककी ज्योतिसे और भी जगमगा रही थीं और इस प्रकार वे अत्यन्त शोभासे सम्पन्न होकर दही मथ रही थीं॥ ४५॥✎ 1675