श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.47.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 47 · अथ सप्तचत्वारिंशोऽध्यायः

आत्मन्येवात्मनाऽऽत्मानं सृजे हन्म्यनुपालये।

आत्ममायानुभावेन भूतेन्द्रियगुणात्मना॥ ३०

ātmanyevātmanā''tmānaṃ sṛje hanmyanupālaye|

ātmamāyānubhāvena bhūtendriyaguṇātmanā|| 30

अर्थ

मैं ही अपनी मायाके द्वारा भूत, इन्द्रिय और उनके विषयोंके रूपमें होकर उनका आश्रय बन जाता हूँ तथा स्वयं निमित्त भी बनकर अपने-आपको ही रचता हूँ, पालता हूँ और समेट लेता हूँ॥ ३०॥

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