॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.45
कस्मात् कृष्ण इहायाति प्राप्तराज्यो हताहितः।
नरेन्द्रकन्या उद्वाह्य प्रीतः सर्वसुहृद्वृतः॥ ४५
kasmāt kṛṣṇa ihāyāti prāptarājyo hatāhitaḥ|
narendrakanyā udvāhya prītaḥ sarvasuhṛdvṛtaḥ|| 45
अर्थ
तबतक एक गोपीने कहा—‘अरी सखी! अब तो उन्होंने शत्रुओंको मारकर राज्य पा लिया है; जिसे देखो, वही उनका सुहृद् बना फिरता है। अब वे बड़े-बड़े नरपतियोंकी कुमारियोंसे विवाह करेंगे, उनके साथ आनन्दपूर्वक रहेंगे; यहाँ हम गँवारिनोंके पास क्यों आयेंगे?’॥ ४५॥