॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.55
यावन्त्यहानि नन्दस्य व्रजेऽवात्सीत् स उद्धवः।
व्रजौकसां क्षणप्रायाण्यासन् कृष्णस्य वार्तया॥ ५५
yāvantyahāni nandasya vraje'vātsīt sa uddhavaḥ|
vrajaukasāṃ kṣaṇaprāyāṇyāsan kṛṣṇasya vārtayā|| 55
अर्थ
नन्दबाबाके व्रजमें जितने दिनोंतक उद्धवजी रहे, उतने दिनोंतक भगवान् श्रीकृष्णकी लीलाकी चर्चा होते रहनेके कारण व्रजवासियोंको ऐसा जान पड़ा, मानो अभी एक ही क्षण हुआ हो॥ ५५॥