॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.47.60
नायं श्रियोऽङ्ग उ नितान्तरतेः प्रसादः
स्वर्योषितां नलिनगन्धरुचां कुतोऽन्याः।
रासोत्सवेऽस्य भुजदण्डगृहीतकण्ठ-
लब्धाशिषां य उदगाद् व्रजबल्लवीनाम्॥ ६०
nāyaṃ śriyo'ṅga u nitāntarateḥ prasādaḥ
svaryoṣitāṃ nalinagandharucāṃ kuto'nyāḥ|
rāsotsave'sya bhujadaṇḍagṛhītakaṇṭha-
labdhāśiṣāṃ ya udagād vrajaballavīnām|| 60
अर्थ
भगवान् श्रीकृष्णने रासोत्सवके समय इन व्रजांगनाओंके गलेमें बाँह डाल-डालकर इनके मनोरथ पूर्ण किये। इन्हें भगवान्ने जिस कृपा-प्रसादका वितरण किया, इन्हें जैसा प्रेमदान किया, वैसा भगवान्की परमप्रेमवती नित्यसंगिनी वक्षःस्थलपर विराजमान लक्ष्मीजीको भी नहीं प्राप्त हुआ। कमलकी-सी सुगन्ध और कान्तिसे युक्त देवांगनाओंको भी नहीं मिला। फिर दूसरी स्त्रियोंकी तो बात ही क्या करें?॥ ६०॥