श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

दिष्ट्या पापो हतः कंसः सानुगो वामिदं कुलम्।

भवद‍्भ्यामुद‍्धृतं कृच्छ्राद् दुरन्ताच्च समेधितम्॥ १७

diṣṭyā pāpo hataḥ kaṃsaḥ sānugo vāmidaṃ kulam|

bhavadbhyāmuddhṛtaṃ kṛcchrād durantācca samedhitam|| 17

अर्थ

‘भगवन्! यह बड़े ही आनन्द और सौभाग्यकी बात है कि पापी कंस अपने अनुयायियोंके साथ मारा गया। उसे मारकर आप दोनोंने युदवंशको बहुत बड़े संकटसे बचा लिया है तथा उन्‍नत और समृद्ध किया है॥ १७॥✎ 1680

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1680 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: भर-कर → भरकर

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