श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भक्त अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा और स्तुति की। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराकर अपनी मधुर वाणीसे उन्हें मानो मोहित करते हुए कहा॥ २८॥
इत्यर्चितः संस्तुतश्च भक्तेन भगवान् हरिः।
अक्रूरं सस्मितं प्राह गीर्भिः सम्मोहयन्निव॥ २८
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भक्त अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा और स्तुति की। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराकर अपनी मधुर वाणीसे उन्हें मानो मोहित करते हुए कहा॥ २८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.28 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 439) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/28/