श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्यर्चितः संस्तुतश्‍च भक्तेन भगवान् हरिः।

अक्रूरं सस्मितं प्राह गीर्भिः सम्मोहयन्‍निव॥ २८

ityarcitaḥ saṃstutaśca bhaktena bhagavān hariḥ|

akrūraṃ sasmitaṃ prāha gīrbhiḥ sammohayanniva|| 28

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! इस प्रकार भक्त अक्रूरजीने भगवान् श्रीकृष्णकी पूजा और स्तुति की। इसके बाद भगवान् श्रीकृष्णने मुसकराकर अपनी मधुर वाणीसे उन्हें मानो मोहित करते हुए कहा॥ २८॥

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