श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः॥ ३०
bhavadvidhā mahābhāgā niṣevyā arhasattamāḥ|
śreyaskāmairnṛbhirnityaṃ devāḥ svārthā na sādhavaḥ|| 30
अर्थ
अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप-जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये। आप-जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं॥ ३०॥
भवद्विधा महाभागा निषेव्या अर्हसत्तमाः।
श्रेयस्कामैर्नृभिर्नित्यं देवाः स्वार्था न साधवः॥ ३०
अपना परम कल्याण चाहनेवाले मनुष्योंको आप-जैसे परम पूजनीय और महाभाग्यवान् संतोंकी सर्वदा सेवा करनी चाहिये। आप-जैसे संत देवताओंसे भी बढ़कर हैं; क्योंकि देवताओंमें तो स्वार्थ रहता है, परन्तु संतोंमें नहीं॥ ३०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.48.30 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 439) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/48/30/