श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.48.4

दशम स्कन्ध · अध्याय 48 · अथाष्टचत्वारिंशोऽध्यायः

तथोद्धवः साधु तयाभिपूजितो

न्यषीददुर्व्यामभिमृश्य चासनम्।

कृष्णोऽपि तूर्णं शयनं महाधनं

विवेश लोकाचरितान्यनुव्रतः॥ ४

tathoddhavaḥ sādhu tayābhipūjito

nyaṣīdadurvyāmabhimṛśya cāsanam|

kṛṣṇo'pi tūrṇaṃ śayanaṃ mahādhanaṃ

viveśa lokācaritānyanuvrataḥ|| 4

अर्थ

कुब्जाने भगवान्‌के परमभक्त उद्धवजीकी भी समुचित रीतिसे पूजा की; परन्तु वे उसके सम्मानके लिये उसका दिया हुआ आसन छूकर धरतीपर ही बैठ गये। (अपने स्वामीके सामने उन्होंने आसनपर बैठना उचित न समझा।) भगवान् श्रीकृष्ण सच्चिदानन्द-स्वरूप होनेपर भी लोकाचारका अनुकरण करते हुए तुरंत उसकी बहुमूल्य सेजपर जा बैठे॥ ४॥✎ 1679

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1679 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: श्याम-सुन्दर → श्यामसुन्दर

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