श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

धृतराष्ट्र उवाच

यथा वदति कल्याणीं वाचं दानपते भवान्।

तथानया न तृप्यामि मर्त्यः प्राप्य यथामृतम्॥ २६

yathā vadati kalyāṇīṃ vācaṃ dānapate bhavān|

tathānayā na tṛpyāmi martyaḥ prāpya yathāmṛtam|| 26

अर्थ

राजा धृतराष्ट्रने कहा—दानपते अक्रूरजी! आप मेरे कल्याणकी, भलेकी बात कह रहे हैं, जैसे मरनेवालेको अमृत मिल जाय तो वह उससे तृप्त नहीं हो सकता, वैसे ही मैं भी आपकी इन बातोंसे तृप्त नहीं हो रहा हूँ॥ २६॥

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