श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.49.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 49 · अथैकोनपञ्चाशत्तमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

इत्यभिप्रेत्य नृपतेरभिप्रायं स यादवः।

सुहृद्भिः समनुज्ञातः पुनर्यदुपुरीमगात्॥ ३०

ityabhipretya nṛpaterabhiprāyaṃ sa yādavaḥ|

suhṛdbhiḥ samanujñātaḥ punaryadupurīmagāt|| 30

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—इस प्रकार अक्रूरजी महाराज धृतराष्ट्रका अभिप्राय जानकर और कुरुवंशी स्वजन-सम्बन्धियोंसे प्रेमपूर्वक अनुमति लेकर मथुरा लौट आये॥ ३०॥

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