श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.5.12

दशम स्कन्ध · अध्याय 5 · अथ पञ्चमोऽध्यायः

ता आशिषः प्रयुंजानाश्‍चिरं पाहीति१ बालके।

हरिद्राचूर्णतैलाद्भिः सिंचन्त्योऽजनमुज्जगुः॥ १२

tā āśiṣaḥ prayuṃjānāściraṃ pāhīti bālake|

haridrācūrṇatailādbhiḥ siṃcantyo'janamujjaguḥ|| 12

अर्थ

नन्दबाबाके घर जाकर वे नवजात शिशुको आशीर्वाद देतीं ‘यह चिरजीवी हो, भगवन्! इसकी रक्षा करो।’ और लोगोंपर हल्दी-तेलसे मिला हुआ पानी छिड़क देतीं तथा ऊँचे स्वरसे मंगलगान करती थीं॥ १२॥

टिप्पणियाँ

  1. १

    जीवेति।

    (मुद्रित पृष्ठ 152)

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